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छत्तीसगढ़ी त्यौहार : छेर छेरा कोठी के धान ला हेर हेरा



छेरछेरा छत्तीसगढ़ का एक आदिवासी त्योहार है जो फसलों की कटाई से संबंधित है। यह त्योहार पौष मास के पूर्णिमा (दिसंबर या जनवरी माह के पूर्णिमा) में मनाया जाता है, जब धान की फसलें लगभग पूर्ण रूप से तैयार होती है। इसे छेरछेरा पुन्नी भी कहते है। यह त्यौहार पूरे राज्य में माने जाता है, इस दिन लोग घर-घर जाकर अन्न मांगते है और आशीर्वाद देते है। यदि आप अधिक अर्जित करना चाहते हैं तो आपको अन्य जरूरतमंदों की मदद करनी चाहिए।
जीवन को दूसरों के साथ आनंद लेना चाहिए, जो कुछ भी हमारे पास है, भविष्य के लिए कुछ भी रखने की बजाय जितना हम दे सकते हैं दुसरो को देना चाहिए।

इस त्योहार का इतिहास

मान्यता है कि इस दिन दान करने से घर में अनाज की कोई कमी नहीं रहती। इस त्योहार के शुरू होने की कहानी रोचक है। बताया जाता है कि कौशल प्रदेश के राजा कल्याण साय ने मुगल सम्राट जहांगीर की सल्तनत में रहकर राजनीति और युद्धकला की शिक्षा ली थी। वह करीब आठ साल तक राज्य से दूर रहे। शिक्षा लेने के बाद जब वे रतनपुर आए तो लोगों को इसकी खबर लगी। खबर मिलते ही लोग राजमहल की ओर चल पड़े, कोई बैलगाड़ी से, तो कोई पैदल।
छत्तीस गढ़ों के राजा भी कौशल नरेश के स्वागत के लिए रतनपुर पहुंचे। अपने राजा को आठ साल बाद देख कौशल देश की प्रजा ख़ुशी से झूम उठी। लोक गीतों और गाजे-बाजे की धुन पर हर कोई नाच रहा था। राजा की अनुपस्थिति में उनकी पत्नी रानी फुलकैना ने आठ साल तक राजकाज सम्भाला था, इतने समय बाद अपने पति को देख वह ख़ुशी से फूली जा रही थी। उन्होंने दोनों हाथों से सोने-चांदी के सिक्के प्रजा में लुटाए। इसके बाद राजा कल्याण साय ने उपस्थित राजाओं को निर्देश दिए कि आज के दिन को हमेशा त्योहार के रूप में मनाया जाएगा और इस दिन किसी के घर से कोई याचक खाली हाथ नहीं जाएगा।

छेरछेरा मनाने के पीछे एक कारण यह भी, जनश्रुति है कि एक समय धरती पर घोर अकाल पड़ी। अन्न, फल, फूल व औषधि नहीं उपज पाई। इससे मनुष्य के साथ जीव-जंतु भी हलाकान हो गए। सभी ओर त्राहि-त्राहि मच गई। ऋषि-मुनि व आमजन भूख से थर्रा गए। तब आदि देवी शक्ति शाकंभरी की पुकार की गई। शाकंभरी देवी प्रकट हुई और अन्न, फल, फूल व औषधि का भंडार दे गई। इससे ऋषि-मुनि समेत आमजनों की भूख व दर्द दूर हो गया। इसी की याद में छेरछेरा मनाए जाने की बात कही जाती है। पौष में किसानों की कोठी धान से परिपूर्ण होता है। खेतों में सरसों, चना, गेहूं की फसल लहलहा रही होती है।

मांगने वाला ब्राह्मण व देने वाली देवी

छत्तीसगढ़ी संस्कृति के जानकार व लोक कलाकार पुनऊ राम साहू बताते हैं कि छेरछेरा के दिन मांगने वाला याचक यानी ब्राह्मण के रूप में होता है तो देने वाली महिलाएं शाकंभरी देवी के रूप में होती है। छेरी, छै+अरी से मिलकर बना है। मनुष्य के छह बैरी काम, क्रोध, मोह, लोभ, तृष्णा और अहंकार है। बच्चे जब कहते हैं कि छेरिक छेरा छेर मरकनीन छेर छेरा तो इसका अर्थ है कि हे मकरनीन (देवी) हम आपके द्वार में आए हैं। माई कोठी के धान को देकर हमारे दुख व दरिद्रता को दूर कीजिए। यही कारण है कि महिलाएं धान, कोदो के साथ सब्जी व फल दान कर याचक को विदा करते हैं। कोई भी महिला इस दिन किसी भी याचक को खाली हाथ नहीं जाने देती। वे क्षमता अनुसार धान-धन्न जरूर दान करते हैं। शाम के समय गांव में डंडा नाचा और मड़ई का भी आयोजन किया जाता है।
आदिवासी लोग इस लोक गीत को भी साथ में गाते है 

छेर छेरा कोठी के धान ला हेर हेरा !!!

छेर छेरा के शुभ अवशर म मोर तरफ से गाणा गाणा बधाई हो !!!

द्वार – द्वार म डालबो डेरा गांव- गली के करबो फेरा
कंधा म झोला लटकाबो अऊ जोर से कईबो…
छेर-छेरा…. कोठी के धान ला हेर हेरा

अरन बरन कोदो करन, जभे देबे तभे टरन,
छेरिक छेरा माई कोठी के धान ल हेरिक हेरा।

छेर छेरा तिहार के जम्मो छत्तीसगढ़िया संगवारी मन ल “कोठी कोठी “बधाई।

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